‘अंग प्रत्यंग’ – अंगो का एकालाप

Pic : Dina Bova

युग्म शब्द ‘अंग – प्रत्यंग’ का प्रयोग बोल चाल की भाषा में पूरे शरीर को उद्धत करने के लिए किया जाता है ! इस शब्द का उपयोग मुहावरे के रूप में शारीरिक भाव या शारीरिक संरचना के सन्दर्भ में भी किया जाता रहा है ! मूलतः इसका सन्दर्भ नाट्य शाश्त्र में सबसे पहले मिलता है ! नाट्य शाश्त्र में शरीर को तीन प्रमुख भागों में विभाजित किया गया है ! अंग , प्रत्यंग, और उप – अंग  !
छः अंग हैं ! शीर्ष / सिर (head), हस्त / हाथ (hand) , वक्ष / छाती (chest) , पार्श्व (sides) ,कटि (hips) , और पाद/ पैर ( leg) ! ग्रीवा / गर्दन (neck) को सातवां अंग मना जा सकता है ! प्रत्यंग भी छह हैं ! स्कंध / कंधे (shoulders), बाहू / बांह (arms ), पीठ , पेट , जांघ ,उरु ! और उप – अंग बारह ! उप – अंग चेहरे की अभिव्यक्ति के लिए महत्वपूर्ण हैं ! नेत्र,भ्रकुटी,नासिका,अधर,कपाल,चिबुक, होंठ, दांत, जीभ, ठोड़ी,पुतुली और चेहरा ! नाट्यशास्त्र के अनुसार, नर्तक या अभिनेता नाटक के अर्थ को चार प्रकार के अभिनयों के ज़रिये प्रस्तुत करता हैः आंगिक या शरीर के विभिन्न अंगों के शैलीपूर्ण संचालन के माध्यम से भावना की प्रस्तुति; वाचिक या बोली, गीत, स्वर की तारता और स्वरशैली से भावना की प्रस्तुति ; आहार्य या वेशभूषा और श्रृंगार से भावना की प्रस्तुति; और सात्विक ! सात्विक अभिनय तो उन भावों का वास्तविक और हार्दिक अभिनय है जिन्हें रस सिद्धांतवाले सात्विक भाव कहते हैं !

हर अच्छे  कलाकार के पास शैलीकृत भंगिमाओं का जटिल भंडार होता है। शरीर के प्रत्येक अंग, जिनमें से आँखें व हाथ सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण हैं, के लिए पारम्परिक तौर पर मुद्राएँ निर्धारित हैं। सिर के लिए 13, भौंहों के लिए 7, नाक के लिए 6, गालों के लिए 6, ठोड़ी के लिए 7, गर्दन के लिए 9, वक्ष के लिए 5 व आँखों के लिए 36, पैरों व निम्न अंगों के लिए 32, जिनमें से 16 भूमि पर व 16 हवा के लिए निर्धारित हैं। पाँव की विभिन्न गतियाँ (जैसे-इठलाना, ठुमकना, तिरछे चलना, ताल) सावधानी से की जाती हैं। एक हाथ की 24 मुद्राएँ (असंयुक्त हस्त) और दोनों हाथों की 13 मुद्राएँ (संयुक्त हस्त), एक हस्त मुद्रा के एक-दूसरे से बिल्कुल भिन्न 30 अर्थ हो सकते हैं।

आजकल की अभिनयप्रणाली में एक चरित्राभिनय (कैरेक्टर ऐक्टिंग) की रीति चली है जिसमें एक अभिनेता किसी विशेष प्रकार के चरित्र में विशेषता प्राप्त करके सब नाटकों / फिल्मो में उसी प्रकार की भूमिका ग्रहण करता है। फिल्मो के कारण इस प्रकार के चरित्र अभिनेता बहुत बढ़ते जा रहे हैं। उनके अभिनय की शैली में ‘अंग – प्रत्यंग’ वही रहते हैं बस फिल्मो में उनके चरित्र के नाम बदलते रहते हैं !

अपनी फिल्मों में चरित्रों के संसार को रचने के क्रम में उनके अभिनय की परिकल्पना पर मेरा मन एक विचार से दुसरे विचार के बीच अपने वेग से विचरता रहता है ! मन में उठते विचार एक सशक्त आवेग हैं जिसकी अभिव्यक्ति के लिए मै सतत प्रयत्नशील रहता हूँ ! प्रस्तुत है मेरे मनोवेग की पहली कड़ी ! ये पंक्तियाँ ‘स्वगत स्वरुप’ में ही मुझ तक अलग अलग विचारों के क्रम में मेरे मन में आयीं जिन्हें मै अपने फेसबुक के वाल पर शेयर करता रहा हूँ !

मैं फेसबुक स्टेटस को ‘मनः स्टेटस’ भी कहता हूँ , मनः स्थिति का परिवर्तित स्व – रूप ! मनोवेग की पहली कड़ी में प्रस्तुत है ‘अंग – प्रत्यंग’ ! कोई अभिनेता अपने शरीर को लेकर अंगो के मेरी इस एकालाप को प्रयोगधर्मी प्रस्तुति में भी बदल सकता है ! अपने ‘मनः Status ‘ का ये साहित्य शेयर करते हुए मुझे ख़ुशी हो रही है !  पढ़िए और भावनाओं के जाने अनजाने सोते में गोते लगाईये … मेरे इन विचारों से आप भी अपने – अपने ‘मनो – योग’ से जुड़िये और जोड़िये ! अगर मेरा ये पोस्ट आपको पसंद आए तो अपने अंग से कहियेगा प्रदर्शित करे … अंग प्रदर्शन के लिए अभिनेता होना जरूरी नहीं है … और अंग प्रदर्शन का मतलब हमेशा वही नहीं होता जिसे हमारा सेंसर दिखाने नहीं देता… आप मुझे अंगूठा तो दिखा ही सकते हैं ;)

कलेजा ठंडा किया जाता है और खून गर्म ! खून को खौला भी सकते हैं ! खून पीना एक बात है और खून का घूँट पीना एक दम अलग बात ! दिल लेने और देने के काम आता है, सबसे ज्यादा टूटता भी यही है ! दिमाग की दही होती है ! छाती चीरते हैं और गर्दन काटी जाती है ! गला काटने और दबाने दोनों के काम आता है ! हाथ और पाँव तोड़े जाते हैं ! पाँव तोड़ के हाथ में भी रखने की बात सुनी जा चुकी है ! उँगलियों पर नाच सकते हैं ! कन्धा दिया जाता है ! दिल पर और सर पर हाथ रखा जाता है ! पैर भारी हो सकते हैं और घुटनों के बल चला जा सकता है ! कान में तेल डाल के सो सकते है, मरोड़ सकते हैं और उसके नीचे बजा भी सकते हैं ! कुछ कान के कच्चे भी होते हैं ! पेट की पूजा होती है ! नाक कट सकती है ! मुँह काला हो सकता है ! हाथ खाली हो सकते हैं ! सर झुकाया और उठाया जाता है ! होंठ सिले जाते हैं ! आँखें बोलती हैं ! कमर कसी जाती है ! करने पर हड्डी पसली एक हो सकती है ! हाथ पीले हों तो अच्छी बात है पर रंगे हाथ पकडे गए तो गए काम से ! आँख फोड़ी जाती है और मुँह तोडा जाता है ! खाल खींची जाती है ! निकलना हो तो बाल की खाल निकाल सकते हैं ! नाक से चने चबा सकते हैं ! दांतों तले उंगलियाँ दबा सकते हैं ! दांत खट्टे हो सकते हैं ! ज़ुबान पर लगाम लगाई जाती है ! आँख मारने के काम आती है , वैसे कई अंग हैं जिनको मारते हैं ! जिस्म के साथ ये सब करना मर्दाना है !

अपने आप को सिर्फ अपने अंगों के भरोसे कैसे छोड़ दें…?

जैसे रेडियो कान में घुस गया है वैसे ही धीरे धीरे टेलीविजन भी आँख में घुस रहा है ! मोबाइल कान और आँख दोनों में घुसा हुआ है ! कैमरा, पर्स, बैग, फोन, छुट्टे पैसों में हाथ पहले से उलझे हुए हैं ! अंगूठी में उँगलियाँ फंसी हैं ! घड़ी और टोटके में कलाई ! जूते चप्पल में पाँव धंसा हुआ है ! गुप्तांगों की तो हालत बहुत खराब है पता नहीं क्या क्या फंसा के कहाँ कहाँ घुसा दिया है ! आँख और नाक पर चश्मा अलग से ! गले की हालत तो ऐसी है की कोई भी काट ले ! दिल दिमाग के बिना सारी कल्पनाएँ अधूरी हैं ! फेफरे में धुंआ भर लिया है और किडनी में शराब ! हम ‘अंग प्रत्यंग’ से खेल रहे हैं…

अंग – प्रत्यंग

जहाँ हम होते हैं जरूरी नहीं वहीँ दिमाग हो !

चाहे कुछ भी बंद करें मुँह खुला रहता है !

दूसरा कदम रखने के बाद पहला कदम पूरा होता है !

गले से उतरते ही ज़हर अपना काम शुरू कर देता है पर उसे गले से उतारना कौन चाहता है ?

दो हाथ हमारे दो मन हैं ! एक कहीं भी पहुँच सकता है और एक सिर्फ कहीं कहीं…

हाथ जोड़ के… घुटनों के बल बैठ के… गोल गोल घूम के… खड़े खड़े… उफ़ ! बाहर कैसे कैसे इशारे…! और वो हमारे अंदर ही है …

मुँह में घी शक्कर बोला ही था थोड़ी चायपत्ती चीनी और गरम पानी भी बोल देते !

जब दिल बैठ जाता है तो कोई और अंग खड़ा होने की ज़ुर्रत नहीं करता !

खड़े होने की बात हो तो बाल और रोंगटे को हम भूल जाते हैं !

सच का साथ दें या न दें इसका फैसला हमेशा हमारे हाथ में रहता है !

मन की आवाज़ आँखों का कोलाज़ है !

जीभ अपना कहा खुद काटती है !

मन कठोर करने के लिए शिलाजीत नहीं खाना पड़ता !

आँखों से सुनना कान से देखना नाक से छूना हाथ से सूंघना पैर से सोचना और दिमाग से चलने को मल्टीमीडिया इफेक्ट कह सकते हैं !

अच्छा रसोइया ज़ुबान खींच लेता है !

हमारा चेहरा हमारे मूड का बर्तन है !

आँखें देखतीं ही नहीं एडिट भी करती हैं !

कैमरे के लिए पल भर में हम अपने अंदर से फोटो वाला चेहरा निकाल लेते हैं !

अलग अलग दोस्तों के लिए अलग अलग भावनाएं रखने में मन मास्टर होता है !

कई लोगों के पैर नहीं होते पर वो ‘sir’ होते हैं !

सच झूठ के बिना नंगा होता है !

आँखे देखती हैं ,मन रंग भरता है !

आप का मुखड़ा किसी जीवन का अंतरा है !

कमर फैशन में है सीना नहीं ! ( छाती ठोकने वालों के लिए )

जब से गुरु ने अंगूठा काट लिया है हम सब अंगुली से ही एक दुसरे को छेड़ रहे हैं !

उस आँख से क्यों नहीं कुछ दीखता जिस आँख में मन है मेरा !

हम अंदर बाहर एक नहीं हैं !

आँख चुराते हैं तो आँख में गिर भी जाते हैं !

आँख में धुल झोंकते हैं !

धुल चाटी भी जाती है !

आँख की सेंकाई करने वाले ही आँख मारते हैं !  आँख का मारा सबूत ही जुटा रह जाता है ! तरसती आँखों के बीच चार चार आँखें ले के घूमने वाले भी हैं ! आँख बिछाई भी जाती है ! फेर ली गयीं आँखें उठती नहीं हैं ! आँख लग जाए तो आँख खुलती नहीं है ! आँखों पर से पर्दा हटाते है तो सब बदल चूका होता है !

Pic : Dina Bova

सांप कलेजे पर खूब लोटते हैं !

कुछ हाथों हाथ लेते हैं तो बात कानों कान फैल जाती है !

हाथों हाथ ली गयी बात कानों कान फैल जाती है !

आप अपने कान खुद क़तर सकते हैं भर नहीं सकते !

कच्चा कान किसी काम का नहीं होता !

कान पर जूँ नहीं रेंग सकता और नाक पर मख्खी नहीं बैठ सकती !

नाक सब रख सकते हैं पर नाक कोई रगड़ना नहीं चाहता ! नाक कटता है तो खून नहीं बहता !

दाँत खट्टे हो जाएँ तो मुह छुपाना पड़ता है ! मुँह की खाने के बाद पता नहीं क्यों दाँत पिसते हैं लोग !

दाँत कटी रोटी मुँह बंद रखता है !

मुँह पर का कालिख मुँह का पानी नहीं धो सकता !

मुँह नहीं रखो तो मुँह उतर जाता है !

मुँह दिखाई के रस्म में मुँह उतार के छुपा नहीं सकते !

दिल पर कोई नहीं लेता अब सब हार्ड डिस्क पर ले लेते हैं !

अक्ल के पास घोड़े होते हैं इसीलिए अक्ल के दुश्मन होते हैं !

आँख दिखाओगे तो आँख ही देखोगे !

पर पूरे अंग में भूत सिर्फ सर पर सवार होता है !

अंग छूटा संग छूटा … !

वैसे अपनी करनी सब अंग याद नहीं रखते !

अंग टूटते हैं ढीले होते हैं पर ये पढ़ के आज अंग अंग मुस्कुराएंगे …

''Sringāra Rasa''': Rasa-Abhinaya by all time great Rasa-Abhinaya maestro (late) Guru Nātyāchārya Vidūshakaratnam Padma Shri Māni Mādhava Chākyār at the age of 89.

”Sringāra Rasa”’: Rasa-Abhinaya by all time great Rasa-Abhinaya maestro (late) Guru Nātyāchārya Vidūshakaratnam Padma Shri Māni Mādhava Chākyār at the age of 89.

इतिहास में मूर्तियों के अंग भंग करना कट्टर प्रतिवाद का प्रमाण रहा है ! जिस्म के साथ मुहावरों, कहावतों और गालियों में बहुत कुछ करते हैं ! सभ्यता के इस पड़ाव पर जिस्म के साथ हम पता नहीं क्या क्या करेंगे और क्या – क्या किया जा सकता है … ! वैसे चौसठ प्रकार पर एक प्राचीन किताब भी है…

क्रमशः

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2 Responses to ‘अंग प्रत्यंग’ – अंगो का एकालाप

  1. Sunil Deepak says:

    वाह, यह तो अँगों प्रत्यँगो से जुड़े प्रसँगों का काव्य रचा है! :)

  2. Hiba says:

    Good to find an epxert who knows what he’s talking about!

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