महानगरीय सोच / महालोक २३

वो महानगर में अक्सर सोचता –
सोचते सोचते सो जाता और नींद में जाकर सपने में सोचने लगता, सोचता हुआ गाने लगता ! गाते गाते रोने लगता और रोते, रोते सोचता ! वो सोचता हुआ चलता चला जाता, और सोचते सोचते सातों समुन्दर पार कर जाता ! वो सोचता हुआ पहुँच जाता किसी ऐसे जगह जो पहले कभी सोची नहीं गयी होती ! वो वहां भी सोचने लगता ! उसके सोच की सीमा हर सीमा को लाँघ चुकी थी ! उसकी सोच हर विंदू को छू चुकी थी ! वो हर सांस में सोचता ! इतना सोचता की सांस लेते ही मोटा हो जाता और सांस छोड़ते ही पतला हो जाता ! वो जिधर देखता सोचने लगता ! जो सुनता सोचने लगता ! जो पढता सोचने लगता ! सोचने से उसके ख्याल बढ़ते ! वो और सोचता और उसके ख्याल और बढ़ते ! स्वाद, भूख, नशा, घमंड, इत्र, लड़की, जानवर, सोना, ईश्वर, संभोग वो सब पर एक साथ सोचता ! उसकी सोच से रोटियाँ फूलने लगतीं, अमरुद पक जाते, सूरज उगता, चढ़ता और डूब जाता ! मौसम बदल जाते ! वो इतना सोचता कि सोच में बच्चे बड़े होकर बूढ़े हो जाते और फिर मर जाते ! औरतें गर्भवती हो जातीं ! अपनी सोच में वो उनके गर्भाशय में सोच भर देता ! माएँ सोच पैदा करतीं ! औरत मर्द मिल के सोचते और सोच सोच के बच्चे पैदा करते ! वो हर तस्वीर पर सोचता ! जब सब उसके सोच की तस्वीरें देखते तब वो तस्वीरों के पीछे बैठ कर सोचता ! वो बड़ा सोचता ! वो इतना सोचता कि छोटी सोच भी बड़ी हो जाती ! वो नया सोचता ! उसके सोच से दिशा बदल जाती ! पूरब पश्चिम हो जाता ! उत्तर दक्षिण हो जाता ! उसकी सोच बड़ी होने लगी और वो अपनी सोच से छोटा होने लगा ! एक दिन वो गायब हो गया ! उसकी सोच उसे कहाँ ले गई ये हम और आप सोच भी नहीं सकते ! वो अभी कहाँ है मुझे नहीं पता पर उसे जरूर पता होगा कि अभी इस वक़्त जब हम उसके बारे में सोच रहें हैं तो उसे कहाँ होना चाहिए ! वो इन बातों को बहुत पहले सोच चूका था ! अभी वो जहाँ भी होगा इसके आगे सोच रहा होगा ! और क्या पता उसने सब सोच भी लिया हो …

‪#‎बदलाव‬

- तुम कितने बदले बतलाओ बदलाव ?

– बदला ले रहे हैं या बदलाव ला रहे हैं ?

– दुराव छुपाव और बदलाव सब एक है !

– बदलाव बस एक प्रस्ताव है !

– आव देखा न ताव कर दिया बदलाव !

– बदलाव, bad – law है !

– बदलाव की राजनीति में राजनीति होती है बदलाव नहीं !

– आओ, जाओ, बदलाव !

– बदलाव है या ऊदबिलाव ?

महानगर में खिंचा – खींची / महालोक – २२

आँख से तो कोई कुछ देखना ही नहीं चाहता सबको मोबाइल कैमरे में सब खींच के किसी और को दिखाना है ! जिसके लिए ये सब किया जाता है वो भी मोबाइल कैमरे में सब कुछ किसी तीसरे के लिए खींच रहा है ! फोटो की खिंचा – खींची में दृश्य की असली तस्वीर मन की आँख से ली ही नहीं जाती … हम देखते ही रह जाते हैं … 

मेरे ख्याल से

हर नए ख्याल में डगमगाती हुई एक अस्वीकृति होती है जिससे लड़ के सबसे पहले उसको जीतना पड़ता है ! हर नया ख्याल सुनाने पर किसी को सुनायी नहीं देता इसीलिए उसे जोर से बोलना पड़ता है ! हर नए ख्याल का एक हमशक्ल ख्याल होता है जिससे मिल कर उसे झुठलाना पड़ता है ! हर नया ख्याल तब तक सिर्फ एक ख्याल होता है जब तक हम उस पर भरोसा नहीं कर लेते ! ख्याल के खो जाने का डर सबसे व्यस्त ख्याल है ! ख्याल कभी अकेले नहीं रह पाते इसीलिए हम उनके साथ रहते हैं ! ख्याल बहुत जल्द बदलते हैं इसीलिए हम उन्हें बाँटते रहते हैं …

– मेरे ख्याल से

महानगर में अभिनेत्री की तलाश / महालोक – २१

पात्र परिचय – अभिनेत्री

चवन्नी सी बदकिस्मत अठन्नी सी बेकार और रुपये सी मुफ्त वो अठारह साल में ही पच्चीस साल सी दिखने वाली लड़की जो महानगर की बदनाम गलियों में ला के छोड़ दी गयी है , जो रंडी बुलाने पर किसी भी मर्द की आँखों में देख के मादरचोद कह सकती है…उसे Bold and beautiful कहना ही काफी नहीं होगा ! मर्द को छठी का दूध याद दिलाने वाली हेठी, अपने आप को साबित करने वाली ज़िद, और मांसल बदन ही उसका परिचय नहीं है ! नमक इतना की किसी को भी आँखों से ही पिघला दे ! निर्वस्त्र किये जाने पर कृष्ण को नहीं बुलाती पर निर्वस्त्र करने वाले के दंभ को खुद ठंडा कर के वापस भेज देती है !

एक महानगरीय लोककथा में ऐसी चरित्र को खेलने के लिए एक अभिनेत्री चाहिए ! बोलने के लिए ताक़तवर शब्द मिलेंगे और करने के लिए मर्मस्पर्शी दृश्य ! महानगरीय भाषा पर पकड़ होना अनिवार्य ! लोककथा की शूटिंग अगले महीने से महानगर में ही होगी ! आपकी काबिलियत और दिलचस्पी पर Audition होगा ! अपनी तस्वीर और इस चरित्र को करने की ख्वाहिश के साथ एक पत्र मेल करें ! ऐसी किसी talented actor के जानकार, model – coordinators , और मददगार मित्र से सहयोग अपेक्षित है !

 

 

#फोटोचापलूसी

- फोटो चापलूस से फोटोग्राफर दुखी रहते हैं !

– ‘फोटो चापलूसी’ में फोटो देखा नहीं जाता सिर्फ लाइक किया जाता है ! 

– ‘फोटो चापलूसी’ Facebook का गहना है !

– फोटो चापलूसी में इंटरनेट होना जरुरी है चापलूस नहीं ! 

– फोटो चापलूस हर फोटो पर दुसरे फोटो चापलूस से टकराते रहते हैं !

हे राम

बापू

बापू

1948 में जिस जगह महात्मा गांधी की हत्या हुई थी वहां की खून से सनी घास और मिट्टी 8 लाख रुपये में नीलाम की गई। मुझे ये सुनकर बहुत आश्चर्य हुआ है और दुख भरा क्रोध भी ! इतने वर्षों से किसी ने खून से सना हुआ घास का वो तिनका सहेज के रखा और उसे लन्दन पहुंचा दिया बेचने के लिए ?

चूँकि हत्या दिल्ली में हुई थी तो घास दिल्ली की ही होगी… खरीद से पहले बापू के खून की साक्ष्य जांच भी हुई होगी !

सोचता हूँ चौसठ साल बाद खून मिला है क्या पाता किसी के पास उनका कभी का वीर्य लगा धोती हो या उनकी बकरी का खाल …कल किसी देश में वो भी बेची जाए…हम बेचने और खरीदने वाले का क्या उखाड़ लेंगे ?

उस वक़्त न तो social मीडिया का फैशन था न टेली -विज़न न कैमरा वाला मोबाइल… चारो तरफ सिर्फ बापू थे ! उस दिन हत्या की घटना स्थल पर से खून से सना मिट्टी और घास उठा के रखने वाले ने क्या सोचा होगा ? उसने इतने सालों तक मरा हुआ खून और घास क्यों सहेज के रखा ? आठ लाख में उसे क्या खरीदना था जो उसने अपनी चौसठ साल की तपस्या को भंग किया ?

आज लाखों करोड़ों अरबों के घोटाले के बीच हमारे गरीब देश में आठ लाख बहुत सारा रुपया होता है …आठ लाख में क्या पाता किसी को अपने बेटे की पढ़ाई करवानी हो या बेटी की शादी या इसे बेच के उस दूरदर्शी ने लन्दन में बहु प्रचलित ‘बॉलीवुड’ की किसी फिल्म के हीरोइन का ब्रा और चड्डी खरीद लिया हो …इन्वेस्टमेंट का दौर है और कौन क्या बेच, खरीद और जमा कर रहा है… क्या पता ?

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बजट प्रार्थना / #बजटप्रार्थना

- हे प्रभु रेलगाड़ी और हवाई जहाज में फर्क बनाये रखना !

- हे प्रभु सबी गोल चीजों की कीमत एक कर दो ! एक शेप, एक प्राइस ! 

- हे प्रभु हम सब गरीबी रेखा में रह लेंगे पर रेखा को और गरीब मत करना !

- हे प्रभु बजट में लगे सभी शुन्यों से भी काम लेना नहीं तो वो बस ज़ीरो बन के रह जाते हैं ! 

- हे प्रभु ब’ ज’ ट’ को टजब या जबट होने से बचाना ! अक्षरों को अच्छे दिन का पता न चले नहीं तो ग’ ज’ ब’ हो जाएगा !  

- हे प्रभु गरीब रेखा से खुश हैं पर अमीर को सनी लिओनी न मिल जाए !

- हे प्रभु इस बार बजट को आम बजट मत कहना, आदमी आम खा चुके हैं, मौसम बदल चूका है !

- हे प्रभु थोड़ा बजट अगले साल के लिए भी बचाना ! 

महालोक – बीस

बुढ़िया का आँचल साइकिल के स्टैंड में फँस गया ! साइकिल अपने जर्जर स्टैंड पर लड़खड़ाई और सड़सठ साल की भूखी, गरीब, बुढ़िया के पाँव को निशाना बना के गिर पड़ने लगी ! लोहे से अपने पाँव को बचाने के लिए कमज़ोर बुढ़िया साइकिल से उलझ पड़ी ! साइकिल का लाल सीट सर से टोपी की तरह बुढ़िया की पाँव पर गिर पड़ा ! बुढ़िया हड़बड़ा गयी ! अपने दुःख की शिकायत करने पहुंची बुढ़िया सरकार के दालान पर उनकी ही साइकिल को अपने पैर पर गिरने से बचाने के लिए साइकिल से गुथ्थम – गुथ्थी कर रही थी और आस पास के लौंडे हंस रहे थे ! बेसहारा अकेली बुढ़िया कातर नज़रों से सब देख रही थी… ! यह सब मैंने एक कार की खिड़की से देखा ! कार के अंदर बैठे कैमरे से आप और क्या उम्मीद कर सकते हैं ! मेरी ली गयी बाकी तस्वीर तो आपने देख ही ली है न ?

काशी शरणम् गच्छामि !

१.

नीचे नीच पड़ा है, ऊँचे ऊँच
कहीं चोंच पड़ा है कहीं पूँछ !

शक्ल पड़ी है शीशे मे, अक्ल पडी है खीसे मे !

कहीं दाम पड़ा है, कहीं आम पड़ा है ,
कटा हुआ दिन सुबह से शाम पड़ा है !

टोपी पड़ी है, सर बड़ा है !

हाथ में बन्दूक है नाल पर घडी ,
छोटा मुँह और बात बड़ी !

समस्या पड़ी है, बन्द घड़ी है !
जात पड़ा है, हाथ पड़ा है, कहीं लात पड़ा है !

हवा बसात है,
मैं खुद पड़ा हूँ !

काशी शरणम् गच्छामि !

*

२.

डेमोक्रेसी का डांसर हूँ , पर फ्रीलांसर हूँ !
वोटिंग में रेगुलर हूँ , पर पार्टी में स्ट्रगलर हूँ !

रोज कर, कर भर कर, ये कर वो कर हूँ !
आप सरकार हैं, मैं आपका नौकर हूँ !

आप चाभी हैं, मैं लॉकर हूँ !
आप मास्टर हैं, मैं जोकर हूँ !

थप्पड़ हूँ, कीचड़ हूँ. कचड़ा हूँ ,
आप हाथ हैं, कमल हैं, झाड़ू हैं !

आप ब्लैकबोर्ड हैं, मैं डस्टर हूँ !
मैं क्वेश्चन हूँ , आप आंसर हैं !
मैं मंच हूँ आप डांसर हैं !

मैं प्यास हूँ आप कोला हैं !
आप नारियल हैं मैं टिकौला हूँ !

मैं जुआ हूँ आप तम्बोला हैं !

मैं दिवार हूँ आप पोस्टर हैं !

काशी शरणम् गच्छामि !