बजट प्रार्थना / #बजटप्रार्थना

- हे प्रभु रेलगाड़ी और हवाई जहाज में फर्क बनाये रखना !

- हे प्रभु सबी गोल चीजों की कीमत एक कर दो ! एक शेप, एक प्राइस ! 

- हे प्रभु हम सब गरीबी रेखा में रह लेंगे पर रेखा को और गरीब मत करना !

- हे प्रभु बजट में लगे सभी शुन्यों से भी काम लेना नहीं तो वो बस ज़ीरो बन के रह जाते हैं ! 

- हे प्रभु ब’ ज’ ट’ को टजब या जबट होने से बचाना ! अक्षरों को अच्छे दिन का पता न चले नहीं तो ग’ ज’ ब’ हो जाएगा !  

- हे प्रभु गरीब रेखा से खुश हैं पर अमीर को सनी लिओनी न मिल जाए !

- हे प्रभु इस बार बजट को आम बजट मत कहना, आदमी आम खा चुके हैं, मौसम बदल चूका है !

- हे प्रभु थोड़ा बजट अगले साल के लिए भी बचाना ! 

महालोक – बीस

बुढ़िया का आँचल साइकिल के स्टैंड में फँस गया ! साइकिल अपने जर्जर स्टैंड पर लड़खड़ाई और सड़सठ साल की भूखी, गरीब, बुढ़िया के पाँव को निशाना बना के गिर पड़ने लगी ! लोहे से अपने पाँव को बचाने के लिए कमज़ोर बुढ़िया साइकिल से उलझ पड़ी ! साइकिल का लाल सीट सर से टोपी की तरह बुढ़िया की पाँव पर गिर पड़ा ! बुढ़िया हड़बड़ा गयी ! अपने दुःख की शिकायत करने पहुंची बुढ़िया सरकार के दालान पर उनकी ही साइकिल को अपने पैर पर गिरने से बचाने के लिए साइकिल से गुथ्थम – गुथ्थी कर रही थी और आस पास के लौंडे हंस रहे थे ! बेसहारा अकेली बुढ़िया कातर नज़रों से सब देख रही थी… ! यह सब मैंने एक कार की खिड़की से देखा ! कार के अंदर बैठे कैमरे से आप और क्या उम्मीद कर सकते हैं ! मेरी ली गयी बाकी तस्वीर तो आपने देख ही ली है न ?

काशी शरणम् गच्छामि !

१.

नीचे नीच पड़ा है, ऊँचे ऊँच
कहीं चोंच पड़ा है कहीं पूँछ !

शक्ल पड़ी है शीशे मे, अक्ल पडी है खीसे मे !

कहीं दाम पड़ा है, कहीं आम पड़ा है ,
कटा हुआ दिन सुबह से शाम पड़ा है !

टोपी पड़ी है, सर बड़ा है !

हाथ में बन्दूक है नाल पर घडी ,
छोटा मुँह और बात बड़ी !

समस्या पड़ी है, बन्द घड़ी है !
जात पड़ा है, हाथ पड़ा है, कहीं लात पड़ा है !

हवा बसात है,
मैं खुद पड़ा हूँ !

काशी शरणम् गच्छामि !

*

२.

डेमोक्रेसी का डांसर हूँ , पर फ्रीलांसर हूँ !
वोटिंग में रेगुलर हूँ , पर पार्टी में स्ट्रगलर हूँ !

रोज कर, कर भर कर, ये कर वो कर हूँ !
आप सरकार हैं, मैं आपका नौकर हूँ !

आप चाभी हैं, मैं लॉकर हूँ !
आप मास्टर हैं, मैं जोकर हूँ !

थप्पड़ हूँ, कीचड़ हूँ. कचड़ा हूँ ,
आप हाथ हैं, कमल हैं, झाड़ू हैं !

आप ब्लैकबोर्ड हैं, मैं डस्टर हूँ !
मैं क्वेश्चन हूँ , आप आंसर हैं !
मैं मंच हूँ आप डांसर हैं !

मैं प्यास हूँ आप कोला हैं !
आप नारियल हैं मैं टिकौला हूँ !

मैं जुआ हूँ आप तम्बोला हैं !

मैं दिवार हूँ आप पोस्टर हैं !

काशी शरणम् गच्छामि !

#झटपटपॉलिटिक्स

 

व्यंजनों के नाम नही होते तो हम स्वाद की राजनीति कैसे करते ?

‘झटपट पॉलिटिक्स’ की अब आदत डाल लेनी होगी !

‘झटपट पॉलिटिक्स’ दिन भर की घटनाओं या दिए गए भाषण के मीडिया प्रचार के आधार पर प्रतिक्रिया दे कर किया जाता है ! कोई भी विषय इससे अछूता नहीं है और इसके विषय की सीमा अनंत है ! रोज बन और बढ़ रहा है ‘झटपट पॉलिटिक्स’ ! 

‘झटपट पॉलिटिक्स’ मीडिया का आइटम नम्बर है !

‘झटपट पॉलिटिक्स’ में गड़े मुर्दों को भी काम मिल जाता है !

‘झटपट पॉलिटिक्स’ की सर्वे में आप भी प्रधानमन्त्री बन सकते हैं !

जब तक हो न जाए आज की ‘झटपट पॉलिटिक्स’ क्या होगी किसी को पता नहीं रहता !

‘झटपट पॉलिटिक्स’ में पार्टी, मुद्दे और फोटो फटाफट बनते हैं !

‘झटपट पॉलिटिक्स’ में खाली सीट भी भरी मानी जाती है !

‘झटपट पॉलिटिक्स’ में सोशल मीडिया आग का काम करती है !

‘झटपट पॉलिटिक्स’ दिखावे की राजनीति का नया नाम है !

‘झटपट पॉलिटिक्स’ कभी भी ज्वाइन किया जा सकता है !

‘झटपट पॉलिटिक्स’ एक नया रोजगार है !

‘झटपट पॉलिटिक्स’ में थकान नहीं होती !

‘झटपट पॉलिटिक्स’ का फल एक दिन में ही पक जाता है !

‘झटपट पॉलिटिक्स’ आपकी है इसे करने से क्या शर्माना !

‘झटपट पॉलिटिक्स’ में हुई बदनामी सूरज के साथ ही अस्त हो जाता है !

महँगाई और गरीबी से परेशान आम आदमी ‘झटपट पॉलिटिक्स’ का रेडीमेड समर्थक है !

वोट देने के बाद हर नागरिक अपनी ऊँगली की तस्वीर के साथ ‘झटपट पॉलिटिक्स’ कर लेता है !

‘झटपट पॉलिटिक्स’ की टोपी कोई भी पहन सकता है !

‘झटपट पॉलिटिक्स’ में मीडिया के पास अगर कैमरा नहीं होता तो वो ख़ुद को भी नहीं पहचानती !

‘झटपट पॉलिटिक्स’ में हर ‘नर’ को ‘मादा’ मिले न मिले, हर नर को ‘मोदी’ जरुर मिलेगा ‘अबकी बार’ !

‘झटपट पॉलिटिक्स’ में सेक्स सबसे जल्दी पकने वाला राजनितिक व्यंजन है

दूषित गंगा के मंथन से सिर्फ राजनितिक कीचड़ निकलेगा शुद्ध गंगाजल नहीं, गंगा साफ़ करने के लिए ‘गंगा मंथन’ झटपट पॉलिटिक्स है सफाई अभियान नहीं 

‘झटपट पॉलिटिक्स’ में महँगाई पर लगी बैठक उठते उठते सस्ती न हो जाए

राग विकट

जनहित में ‘राग विकट’ ! ‘राग विकट’ को ‘देश राग’ में गाने की जरुरत नहीं है ! इसे ‘अपनी डफली – अपना राग’ में गाया जा सकता है !

आ जपा / फिर मन भा जपा ! जपा, जपा / मन नमो, नमो !
दफ़ा दफ़ा / क्यों ख़फ़ा, ख़फ़ा ! जपा, जपा / मन नमो, नमो !

आ जपा / फिर मन भा जपा ! जपा, जपा / मन नमो, नमो !
नफ़ा नफ़ा / सब सटा सटा ! जपा, जपा / मन नमो, नमो !

आ जपा / फिर मन भा जपा ! जपा, जपा / मन नमो, नमो !
सपा सपा / सब सफा सफा ! जपा, जपा / मन नमो, नमो !

आ जपा / फिर मन भा जपा ! जपा, जपा / मन नमो, नमो !
हटा हटा / सब बँटा बँटा ! जपा, जपा / मन नमो, नमो !

आ जपा / फिर मन भा जपा ! जपा, जपा / मन नमो, नमो !
रुका रुका / सब रुका रुका ! बढ़ा, बढ़ा / बस नमो नमो !

आ जपा / फिर मन भा जपा ! जपा, जपा / मन नमो, नमो !
खुला खुला / मुंह खुला खुला ! जपा, जपा / मन नमो, नमो !

आ जपा / फिर मन भा जपा ! जपा, जपा / मन नमो, नमो !
खिला खिला / कमल खिला / जपा, जपा / मन नमो, नमो !

आ जपा / फिर मन भा जपा ! जपा, जपा / मन नमो, नमो !
सीला सीला / सब होंठ सीला ! जपा, जपा / मन नमो, नमो !

आ जपा / फिर मन भा जपा ! जपा, जपा / मन नमो, नमो !
इकट विकट / सब महा टिकट ! जपा, जपा / मन नमो, नमो !

लघु प्रेम कथा / लप्रेक

लप्रेक – १.

लड़की जाने लगी तो लड़के ने फटाफट मोबाइल से लिफ्ट में उसकी एक तस्वीर ले ली जिसमे लड़की मुस्कुराती हुई हाथ हिला के विदा ले रही थी, उसने अपने पूरे कपड़े तरतीब से पहन रखा था और खुश दिख रही थी ! लिफ्ट का दरवाज़ा बंद होते ही लड़के ने लम्बी सांस ली और फ़ोटो ऑप्शन में जा कर सेव का बटन दबा दिया ! आज उनकी अकेले में पहली मुलाकात थी ! प्रेम का कोंपल आज ही फूटा था …

*

लप्रेक – २.

नहीं ! हाँ ! फिर नहीं ! फिर हाँ ! फिर फिर नहीं ! फिर फिर हाँ ! नहीं ! हाँ ! नहीं ! हाँ ! नहीं ईईई … !! हाँ आँआ… !! बस ये उनकी आखरी बातचीत थी ! कम्प्यूटर पर दोनों मौन अपने अपने विंडो को घूरते रहते ! एक मन हाँ कहता और एक मन ना !

*

लप्रेक – ३.

वो ‘कैंडी क्रश’ से रूठती है तो मुझसे बात करती है !

*

लप्रेक – ४.

डार से बिछुड़ते ही वो हमेशा के लिए फिर मिलने की उम्मीद से बंध जाते हैं … टूटते ही फिर से जुड़ने की परिकल्पना बन जाती है … जाने के बाद ही आना होता है …सच के भरोसे ही झूठ को हम टटोलते हैं …पता नहीं ख़ुशी को ग़म के बगैर कैसे पहचानते… ? अन्त ही शुरुआत है  …

*

लप्रेक – ५.

हंसती थी तो फंसती थी अब फंसती है तो रोती है…

*

लप्रेक – ६.

‘ऑरकुट’ में नाराज़ हुए थे, पूरा ‘व्हाट्सप’ चुप रहे अब जा कर ‘ट्विटर’ पर माने हैं बीच में ‘फेसबुक’ पर कितना स्टेट्स आ के चला गया …

*

लप्रेक – ७.

एक मन की मान लूं पर दूसरे मन को क्या जवाब दूं ? एक मन से कह दूं पर दूसरे मन से कैसे छुपाऊँ ? तू भी or not तू भी …

*

लप्रेक – ८.

‘हैशटैग’ के चकोर चौखट से बांध कर जब कोई लड़की किसी लड़के से प्रेम करती है तो प्रेमी फिर किसी बन्धन से बंधें न बंधें …

*

लप्रेक – ९ .

‘ काश वो मेरा ‘इनबॉक्स’ पढ़ पाती … ‘

*

लप्रेक – १०.

‘को – रस’ में ‘लव – रस’ :

सुनो लड़कियों – न लड़के साथ आए थे न लड़के साथ जायेंगे !

सुनो लड़कों – न लड़की साथ आयी थी न लड़की साथ जाएगी !

*

लप्रेक - ११.

मछली के पेट में अँगूठी बहुत दिनों तक नहीं रह सकी ! लेखक ने मछली को जाल में फंसवा के मछुआरे से उसकी पेट चिरवा दी और अँगूठी को राजा के सामने रखवा दिया ! शकुंतला की आँखों में आँसू भला कौन लेखक देख सकता है ?

 

पोस्टर – वार

चुनाव मैदान से ‘पोस्टर – वार’ का एक दृश्य ! इसमें मंच है ! पर्दा है ! पोस्टर है ! चेहरे हैं ! रंग है और नाटक का मसाला है !

Cut to -

चार पोस्टरों ने मुझे घेर लिया था ! चारों प्रचार पोस्टर थे ! शाब्दिक,ग्राफिक और तथ्यों से भरी उनकी अपनी – अपनी विचारधारा थी ! सब मुझ पर चिपकना चाह रहे थे ! एक सत्ता का पोस्टर था जो लगातार सत्ता में होने की वजह से परिवर्तन के सूत्रधार की भेष में था ! चेंज का एजेंट था ! देखने में हाथ से बना ये पोस्टर डिजिटल था ! दूसरा विपक्षी पोस्टर था ! वो जघन्य था ! रूढ़ियों से चिपका था ! तीसरा जनतांत्रिक पोस्टर था ! ये पोस्टर सबसे ज्यादा आकर्षक था क्योंकि इसमें मिडिल क्लास था ! चौथा पोस्टर एक कोलाज था ! जोड़ तोड़ से बना यह पोस्टर हिलते डुलते फ्रेम में किसी तरह फिट था ! ये चारो पोस्टर मुझे घेर के खड़े थे और मैं अवाक था ! जब बरसों तक सोयी राजनीती एक बड़ी करवट लेती दिखाई दे रही थी तभी ये घटना घट गयी थी ! पौ फटने को था ! सब जाग रहे थे ! मैं सुबह घूमने निकला था और उन्होंने सोचा मैं रात का भुला हूँ !

Cut to -

वार रूम था ! मुख्यालय था ! इनपुट डेटा था ! रणनीति थी ! तकनीक था ! उपकरण थे ! टीम थी ! प्रयोजन था ! कई दल थे ! ‘युद्ध’ का माहौल था ! हर तरफ बैठक चल रही थी ! रिजल्ट का सबको इंतज़ार था !

Cut to -

मैं पोस्टर में फँस कर चल नहीं पा रहा था ! आगे अब क्या करूँ कुछ सूझ नहीं रहा था ! पोस्टर से बच कर निकलने की मेरे पास कोई स्ट्रेटेजी नहीं थी ! सब पोस्टर से बच रहे थे और मैं फंस गया था ! पोस्टर मुझे घेर के अपने ‘आदमी घेरो अभियान’ में सफल हो गए थे और मैं ‘ पोस्टर से बचो ‘ खेल में हार गया था और अब शहर भर के सभी आदमीयों, औरतों, बच्चों और बूढ़ों को घेरने की उनकी उम्मीद बढ़ गयी थी !

Cut to -

कमल, हाथ, झाड़ू, साइकिल, हाथी, हल, तीर, नगाड़ा, लालटेन, हँसिया – हथोड़ा,फूल – पत्ती , शंख, चक्र,गदा, टेलीफ़ोन, सब वस्तु और जीव पोस्टर पर क्रांतिकारी हो गए थे !

Cut to -

पोस्टर, तख्तियों और बैनर के रूप में नौजवान, आधुनिक, उदार, और भ्रष्ट जिन चार पोस्टरों ने मुझे घेरा था उसके पीछे और भी पोस्टर थे ! कोरस में स्वास्थ, सेक्स, विकास, नारी मुक्ति, धर्म, दूकान, सामान, मकान, तम्बाकू, सबके पोस्टर थे ! उनमे बहुत सारे शब्द और चित्र का कोलाज था ! सबके मिलेजुले रंग थे ! पोस्टर में वे कौन – कौन थे, क्या – क्या थे कहना मुश्किल था ! बचपन से ले कर अब तक इनमे से कई पोस्टरों से मैं मिल चूका था ! उस पर लिखी  हर बात पढ़ चूका था ! उनके रंग में बारी बारी से रंगा जा चूका था ! कई पोस्टर का नारा तो मुझे याद भी था ! कुछ पोस्टर हवा में लहरा रहे थे ! इन सब में विज्ञापन के सैकड़ों पोस्टर उनका साथ दे रहे थे ! सब बहुत अब्सर्ड था !

Cut to -

तभी एक धमाका हुआ और बीस हज़ार पोस्टर का गोला मेरे आगे फट गया ! अफरा तफरी मच गयी ! चारो तरफ पोस्टर ही पोस्टर थे ! सब पोस्टर पर थे ! जो पोस्टर पर नहीं थे वो पोस्ट पर थे ! बड़े बड़े पोस्ट पर बड़े बड़े पोस्टर थे ! मुझसे बार बार कहने लगे कि मैं अपनी पीठ उनको दे दूँ ! मुझे लगा थपथपाएंगे पर उन्होंने झट पट पीठ पर एक पोस्टर चिपका दिया ! अब पोस्टर देखते ही लोग पीठ पर चटका लगाने लगे ! पीठ सहलाने वाला कोई नहीं था ! पीठ थपथपाने वाले मौके का फायदा उठा के पोस्टर चिपका गए ! पोस्टर की वज़ह से पीठ में खुजली होने लगी ! मुझे अपनी खुजली मिटाने के लिए किसी और की पीठ खुजानी पड़ी !

Cut to -

पीठ से अच्छी जगह किसी पोस्टर के लिए अब नहीं बची है ! जिनके पास इच्छा है उनके पास अपनी पीठ है ! पोस्टर की दुनिया में अब पीठ ही पूँजी है ! पुलीस का हमला पीठ पर होता है ! सरकार का पेट पर ! पोस्टर ने उनको एक कर दिया है ! पोस्टर की दुनिया में पीठ और पेट एक हो गए हैं ! जैसे ही पीठ और पेट एक होते हैं हाथ लहराने लगता है ! हमारी पीठ अब सबसे महँगी खाली जगह है ! जब तक अपनी रीढ़ की हड्डी न बेचें पीठ के मालिक हम ही होते हैं !

Cut to -

अजब देश की गजब होली खेली जा रही थी ! ‘पोस्टर वार’ में मैंने देखा एक पोस्टर दूसरे पोस्टर पर कीचड उछाल रहा था !  हाथ और पाँव से बने पोस्टर थे ! पर वो शरीर के नहीं शोषण की बैचैनी के पोस्टर थे ! झंडे में लिपटी औरत का पोस्टर न देश का था न महिला उत्पीड़न का ! मुझे बहुत आश्चर्य हुआ वो महंगे जूते का पोस्टर था ! कुछ पोस्टर में जलते हुए शब्द थे ! उनका हर अक्षर आग से लिपटा धू धू कर रहा था ! फेफड़े का पोस्टर पेड़ के जड़ बने थे ! हर पोस्टर मानव बम लग रहा था ! पोस्टर पर बच्चों तक को हर्फ़ बना दिया गया था और खुद उनका बस्ता बन गए ! कई पोस्टर बदनाम थे ! उनका गज़ब इतिहास था ! उन पर कालिख पोती जा चुकी थी ! कीचड़ उछाला जा चूका था ! उन्हें फाड़ा गया था ! उनमे से कई जले हुए पोस्टर थे जिन्हे जलाया गया था ! सबके अंदर एक पोस्टर छुपा था ! सब अपने अंदर के छुपे पोस्टर के साथ अश्लील हरकतों की फैंटसी रखते थे ! इन सबके बीच नौटंकी के पोस्टर भी थे ! चाय के भी पोस्टर थे जिस पर वाह उस्ताद लिखा था !

Cut to -

अब मुझे पता चला की मेरे अंदर भी एक पोस्टर है ! मिक्स्ड फीलिंग वाला पोस्टर ! हम देखते पहले हैं और पढ़ते बाद में हैं ! चित्र पहले और शब्द बाद में ! बच्चा पहले देखना सीखता है और पढ़ना बाद में ! हम आज कल आस पास क्या देख रहे हैं ? पोस्टर के साथ चित्र, प्रदर्शनी, झांकी, सिनेमा, टेलीविजन, कवर पेज, और हेड लाइन्स ! रंग विरंगे शब्दों के झूठे खोखले वादे और एक दुसरे पर फेके गए बदरंग पानी के गुब्बारे ! शानदार, जानदार, ईमानदार, बिकाऊ, विरोधी, बईमान ,विचार, पत्रकार जैसे कई शब्द पोस्टर से निकल कर मुझे चारो तरफ से खींचने लगे ! मेरी घबराहट बढ़ गयी ! सब गड्ड मड्ड हो गया ! पोस्टरों ने खिचड़ी पका के दिमाग की दही जमा दी थी ! समाधान ‘हाथ’ में है, ‘झाड़ू’ घर में है, ‘कमल’ मन में खिला है फिर भी चारो तरफ भ्रष्टाचार है, महँगाई है, घरके बाहर गंदगी है और मन अशांत है ! चारो ओर ये कैसा ‘पोस्टर वार’ है ?   मैं चीखना चाहता था ! मेरी आँखें भर आयीं !

Cut to -

इतने में आकाश से संविधान – वाणी हुई ” मत भूल बेटा, तेरे पास है नोटा , फिर क्यों तू रोता ” … मैं जोर से चिल्लाया ! ” नॉन ऑफ़ द अबोव, नॉन ऑफ़ द अबोव,  नॉन ऑफ़ द अबोव ” फिर अंग्रेजी में चीखा NOTA , NOTA , NOTA  !!!  हनुमान चालीसा पढ़ते ही जैसे भूत भाग जाते हैं वैसे ही पोस्टर ने मुझे मुक्त कर दिया ! उन्हें देख कर लग रहा था जैसे उन्हें सांप सूँघ गया हो ! सर, सर करने लगे ! मेरी भी हिम्मत बढ़ी  ! मैंने चैन की सांस ली ! पोस्टर को पता चल गया था कि मुझे अपने अधिकार और जिम्मेदारियों के साथ अपनी सभी संवैधानिक सुविधाओं का ज्ञान है ! जितना उन्होंने सोचा था उतना मुर्ख नहीं हूँ ! मैं नए भारत का पढ़ा लिखा और अपना विवेक रखने वाला एक मतदाता हूँ जो स्वतंत्र है और निर्भीक है !

Cut to -

तभी नींद भंग हो गयी ! मेरी आँख खुल गयी ! लगा कोई मोहभंग हो गया है ! बहुत देर तक निढाल मैं बिस्तर पर पड़ा रहा ! हवा तेज़ थी देखा तो पंखा चल रहा था ! अब बाहर निकल कर चल रहे  ‘पोस्टर वार’ के हर पोस्टर की सच्चाई का मुझे सामना करना था !

( प्रभात खबर में प्रकाशित )

एक बुलेट और दो प्रेमी – Cut to – ए ‘लभ स्टोरी’

मुझे एक जोड़ी लव स्टोरी मिली है ! शेयर कर रहा हूँ !
सड़क जैसी रहस्यमय और प्रेम जितनी सुंदर !

इस जोड़े से आप भी मिलिए !

साहचर्य का एक मुक्तक

उनके पास बहुत सा रंग था और दोनों पागल थे इसीलिए प्रेमी थे ! उन दोनों की चार आँखों में दो मछली रहती थी ! दोनों ‘बुलेट – बाज’ थे और ‘लभर’ थे ! ये उनकी ‘लभ स्टोरी’ है !

” इस पार मधु है तुम हो प्रिये , उस पार न जाने क्या होगा “

दो प्रेमी

एक चश्मे-मूंछ वाला …

एक चश्मे-मूंछ वाला

और एक मछली लंबे बालों वाली …

एक मछली लंबे बालों वाली

ये उनका प्रेम हस्ताक्षर था -

” एक चश्मे-मूंछ वाला और एक मछली लंबे बालों वाली ” / प्रेम हस्ताक्षर

Cut to -

खुली आकाश के नीचे एक रात तारों के बीच दो प्रेमी ने एक सपना देखा !

Cut to -

उन्होंने एक घोसला बनाया , उसका नाम था  ‘Artologue – Art for all’

ये इस जोड़े का घोसला है जिसमे चित्र और शब्द के तिनके हैं !

जोड़े का घोसला

” इस बार फिर दीवाली में घरौंदा बनाएंगे और बच्चे हो जाएंगे “

आशाओं के रंग

Cut to -

बुलेट

‘… और हम बुलेट के मालिक हो गए ‘ / भाग एक ,

‘… और हम बुलेट के मालिक हो गए / भाग दो

” बुलेट – बाज़ “

” बुलैट पर बैठता हूं तो शायद पूरा हो पाता हूं “

Cut to -

” दूई ठो भैलेन्टाइन – बीबी और बुलेट ” – सच हुआ हुआ एक सपना

” बीबी और बुलेट “

Cut to -

तैयारी

रंग

बुलेट

” थोड़ी और सज जाए बुलेट तो क्या बुरा है “

First stop- Pune

Cut to -

Pune – Goa

‘बुलेट – बाज’ लभर दोनों निकल पड़े

” चल मेरी बुल्लेट “

एक बुलेट और दो प्रेमी

MAG on the Move: Western Ghats

“प्रेम – पथ ”

” ए शहर रंग दूंगा तुझे “

Cut to -

वायरिंग की समस्या हो गई । दो किलोमीटर धकेलना पड़ा …

आज का दिन बुलेट के नाम

Lessoning From Bullet

till i get my bullet back …

मकेनिक अनूप सिंह

Cut to -

Goa

मोटर – साईकिल डायरी    : यात्रा वृतांत

Cut to -

दाम्पत्य का सेल्फी

फ्रेम में तीनों दीवाने, जुनून का सेल्फी

तीन फरवरी से तीन मार्च । पांच राज्य,सात शहर, नौ परिवार, छह पेंटिंग, 2000 किलोमीटर,एक हरी बुलेट, ढेर सारे रंग और डांगरी पहने दो पागल …

इस तस्वीर को डिफाइन करना मुश्किल है

कैमरे की आंखों में आंखे डाले

Cut to -

होसूर के द टाइटन स्कूल के 120 बच्चे और करीब तीस फीट लंबी और चार फीट चौड़ी दीवार…

प्रेमी मछली का समुद्री जीवन

Cut to -

बच्चों के अंदर के कला के तार छू आये दोनों …

कला से झंकृत बच्चे

बच्चों की हथेलियां उनकी यात्रा की बॉर्डर बनीं

Cut to -

दो पागल आए थे । हरी बुलेट पर सवार । कुछ रंग लेकर । लीप पोत कर चले गए । हमारा  घर । हमारा  दिल …

Tara and Mohanan Uncle’s place Pune

Ravi Kasia and Pari , Goa

Malini Manjunath Adiga Family, Kundapur

Shirley Ann George Family

तबरेज़ के घर की आज़ादी

Cut to -

शुक्रिया ‘DL9SR 1583′ यानी हरी बुलेट का / बुलेट की निजी डायरी

Cut to -

आत्म मंथन

” हर छुट्टी ऐसी हो तो क्या बात होगी … “

card appears

” journey continues …

” पिक्चर अभी बाकी है दोस्त “

End Credits

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1.Jey Sushil – https://www.facebook.com/sushil.jha.923

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So, what are you waiting for…Invite us

” Meenakshi Jha – Jey Sushil – Bullet “

सुशील झा बी बी सी में कार्यरत हैं. उनकी शिक्षा जादूगोड़ा (झारखण्ड), जे एन यू और IIMC, दिल्ली में हुई. आजकल दिल्ली में रहते हैं. उनसे sushilkumar.jha@gmail.com पर संपर्क किया जा सकता है.

सुशील झा

 

सब फोटो साभार: Artologue / Jey Sushil / Vikas Kumar Ashok Adepal / MAG- Meenakshi Art Gallery

शब्द चित्र / जंगल – मंगल.

किस बात पर झगड़ा हुआ ये कोई नहीं जानता पर कल जंगल में एक अजगर घड़ियाल से भीड़ गया ! एक घंटे तक घमासान हुआ, दोनों में खूब गुत्थम – गुत्थी हुई और अंत में अजगर घड़ियाल को मार के निगल गया ! इस बात से जंगल में सनसनी फ़ैल गयी है … ! जिन्होंने ये घटना देखी उनकी आँखें फटी रह गयीं ! वो जंगल का नया इतिहास देख रहे थे ! कल तक जो घड़ियाल सबका पेट चीरता था आज मरा हुआ अजगर के पेट में पड़ा था ! घड़ियाल को निगलने के बाद अजगर का पेट घड़ियाल के आकार का हो गया था ! घड़ियाल की मोटी लम्बी कंटीली पूँछ, दांतों से भरा जबड़ा, खुरदुरे पैर सब शिथिल थे मानो उसने अजगर का पेट ओढ़ लिया हो ! जितना पचा नहीं सकता उससे ज्यादा अजगर ने खा लिया था और निढाल पड़ा था ! जंगल मुर्दा शान्ति से भर गया था ! सब जानते हैं कि जंगल में कोई नियम नहीं चलता और जंगल का यही नियम है … जंगल की लड़ाई में चाहे जो जीते, जीत जंगल की ही होती है !

शब्द चित्र : तीन माइ’क के लाल उर्फ़ ‘बाकी बच गया अण्डा’

आज – कल सबको सुन रहा हूँ ! सब माइ’क के लाल लग रहे हैं … ! सब माइ’क के लाल कूद पड़े हैं … ! आप भी सुनिये ! मुझे बाबा नागार्जुन की उन्नीस सौ पचास में लिखी उनकी कविता ‘बाकी बच गया अण्डा’ की याद आ गयी …

 

माई’क का लाल – एक

माई’क का लाल – दो

माई’क का लाल – तीन

बाकी बच गया अण्डा / नागार्जुन

पाँच पूत भारतमाता के, दुश्मन था खूँखार
गोली खाकर एक मर गया, बाक़ी रह गए चार

चार पूत भारतमाता के, चारों चतुर-प्रवीन
देश-निकाला मिला एक को, बाक़ी रह गए तीन

तीन पूत भारतमाता के, लड़ने लग गए वो
अलग हो गया उधर एक, अब बाक़ी बच गए दो

दो बेटे भारतमाता के, छोड़ पुरानी टेक
चिपक गया है एक गद्दी से, बाक़ी बच गया एक

एक पूत भारतमाता का, कन्धे पर है झण्डा
पुलिस पकड कर जेल ले गई, बाकी बच गया अण्डा

रचनाकाल : 1950

( Pic Credit : Google Search )